मुहूर्त
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) मुहूर्त
बालक को यज्ञोपवीत पहनाकर गायत्री मंत्र की दीक्षा देने का संस्कार उपनयन या जनेऊ संस्कार है। वेद अध्ययन के आरंभ का यह संस्कार सोलह संस्कारों में प्रमुख है।
- शुभ नक्षत्र
- अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती
- शुभ तिथियाँ
- उत्तरायण में शुक्ल पक्ष की तिथियाँ
- जाँचा गया शहर
- चेन्नई
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के बारे में
बालक को यज्ञोपवीत पहनाकर गायत्री मंत्र की दीक्षा देने का संस्कार उपनयन या जनेऊ संस्कार है। वेद अध्ययन के आरंभ का यह संस्कार सोलह संस्कारों में प्रमुख है।
विधि
पिता या आचार्य बालक को यज्ञोपवीत पहनाते हैं और एक वस्त्र के नीचे गायत्री मंत्र का उपदेश देते हैं। फिर बालक माता से भिक्षा माँगता है, जो विद्यार्थी का पहला कर्म माना जाता है।
ऋतु और आयु
सूर्य के उत्तर की ओर चलने का उत्तरायण काल, विशेषकर वसंत ऋतु, श्रेष्ठ है। परंपरा में आठ वर्ष की आयु बताई गई है, पर कई परिवार सुविधा की आयु में करते हैं।
उपनयन के बाद
जनेऊ धारण करने वाला बालक नित्य संध्या वंदन और गायत्री जप सीखता है। हर वर्ष श्रावणी पूर्णिमा को जनेऊ बदलना इसी संस्कार की निरंतरता है।
परिवार की भूमिका
उपनयन से पहले नान्दी श्राद्ध करके पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है। मामा बालक को वस्त्र भेंट करते हैं और संबंधी भिक्षा देते हैं। उसी दिन से बालक नित्य संध्या वंदन करना सीखता है, जो जीवन भर का अनुशासन बनता है।
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के शास्त्रीय नियम
शुभ नक्षत्र: अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती। शुभ तिथियाँ: उत्तरायण में शुक्ल पक्ष की तिथियाँ। वर्जित: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अमावस्या, दक्षिणायन (कई परिवारों में)।
तिथियाँ कैसे चुनी जाती हैं
यह सूची चेन्नई में सूर्योदय के समय इस संस्कार के लिए अनुकूल नक्षत्र और तिथि वाले दिन दिखाती है। पूर्ण मुहूर्त में वार, योग, करण, कार्य के समय का लग्न, राहुकाल और संबंधित लोगों की कुंडली भी देखी जाती है; इसलिए इस सूची से दिन छाँटें और सटीक समय मुहूर्त खोज से तय करें।
सामान्य प्रश्न
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के लिए कौन से नक्षत्र शुभ हैं?
परंपरा के अनुसार उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के लिए शुभ नक्षत्र हैं: अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती।
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के लिए कौन सी तिथियाँ शुभ हैं?
शुभ तिथियाँ: उत्तरायण में शुक्ल पक्ष की तिथियाँ (हर पक्ष में गिनी जाती हैं)।
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) में किन बातों से बचना चाहिए?
शास्त्रीय सूचियाँ इनसे बचने को कहती हैं: रिक्ता तिथियाँ (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी), अमावस्या, दक्षिणायन (कई परिवारों में)।
क्या ये तिथियाँ हर शहर के लिए मान्य हैं?
तिथियाँ चेन्नई के सूर्योदय पर जाँची गई हैं। नक्षत्र और तिथि का परिवर्तन हर जगह एक ही क्षण होता है पर स्थानीय समय अलग होता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देखें।
क्या व्यक्तिगत मुहूर्त फिर भी ज़रूरी है?
बड़े संस्कारों के लिए हाँ। तारा बल, चन्द्र बल और कार्य का लग्न संबंधित लोगों की कुंडली से तय होते हैं।
सूची में कितनी तिथियाँ हैं?
अगले साठ दिनों में वे बारह तक दिन, जिनमें नक्षत्र और तिथि दोनों नियम मिलते हैं।
क्या राहुकाल देखा गया है?
राहुकाल पूरे दिन का नियम नहीं, दिन का एक खंड है। सटीक समय तय करते समय उससे बचें; हर तिथि के पंचांग पृष्ठ पर वह दिया है।
क्या दूसरे संस्कारों के लिए भी खोज सकते हैं?
हाँ। मुहूर्त खोज कई और कार्यों के लिए दिन क्रम से दिखाती है और आप अपना जन्म विवरण भी जोड़ सकते हैं।
क्या उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) का मुहूर्त हमारी कुंडली के अनुसार बदला जा सकता है?
हाँ। सामान्य मुहूर्त सबके लिए शुभ समय दिखाता है; परिवार के ज्योतिषी संबंधित लोगों के जन्म नक्षत्र और चल रही दशा देखकर उनमें से सबसे अच्छा समय चुनते हैं।
शुभ दिन न मिले तो उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) कैसे करें?
उपलब्ध दिनों में सबसे अच्छा दिन चुनकर, गणेश और कुलदेवता की पूजा से आरंभ करें, और मुख्य क्षण को बलवान लग्न या अभिजित मुहूर्त में रखें, यही परंपरा है।
उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार) के लिए दिन का कौन सा समय अच्छा है?
प्रायः प्रातः या पूर्वाह्न का समय पसंद किया जाता है। राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल से बचकर शुभ होरा में आरंभ करना परंपरा है।